Haryana Water Resources Atlas 2025: AI से मिलेगी जमीन के नीचे और ऊपर की पानी से जुड़ी हर जानकारी, एक क्लिक में
पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हरियाणा ने अब समाधान के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया है। राज्य सरकार ने ‘हरियाणा वॉटर रिसोर्स एटलस 2025’ लॉन्च कर दिया है, जो AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से संचालित एक जियोस्पेशियल प्लेटफॉर्म है। इस प्लेटफॉर्म की मदद से जमीन के नीचे और ऊपर की पानी से जुड़ी हर जानकारी, एक क्लिक पर मिलेगी—वो भी लाइव!

चंडीगढ़: इस एटलस के ज़रिए किसान, अधिकारी और आम नागरिक जान सकेंगे कि उनके इलाके में भूजल कितना बचा है, नहरों का क्या हाल है, कौन-सी फसल पानी ज्यादा खा रही है, और किन क्षेत्रों में वाटर रीचार्ज की ज़रूरत है। राज्य के 76% से ज्यादा ब्लॉक ‘क्रिटिकल’ या ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ की स्थिति में हैं, ऐसे में यह प्लेटफॉर्म सही जानकारी से समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी पहल में सरकार को एक रुपये का भी अतिरिक्त खर्च नहीं आया, क्योंकि इसे हरियाणा स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (HARSAC) ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता से इन-हाउस तैयार किया है। अब सवाल यह है कि क्या ये हाई-टेक प्लेटफॉर्म सिर्फ स्क्रीन तक सीमित रहेगा या असल में नीति और ज़मीन पर भी बदलाव लाएगा?

अब हरियाणा का ‘पानी’ स्मार्टफोन पर — एटलस देगा जमीनी हकीकत की पूरी तस्वीर
हरियाणा वॉटर रिसोर्स एटलस 2025 को HARSAC और हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण ने मिलकर तैयार किया है। इसे https://hwra.org.in/Atlas2025/ पर कोई भी देख सकता है। यह प्लेटफॉर्म भूजल स्तर, सतही जल स्रोत, नहरें, एक्विफर, रीचार्ज ज़ोन और फसल पैटर्न जैसी जानकारियां रियल टाइम में देता है।
GMDA के जीआईएस प्रमुख डॉ. सुल्तान सिंह के मुताबिक, “ये सिर्फ एक नक्शा नहीं, बल्कि एक जिंदा और सीखने वाला AI सिस्टम है। अधिकारी से लेकर किसान तक कोई भी इससे अपनी ज़रूरत की जानकारी तुरंत ले सकता है।”
जल स्तर गिरा, लेकिन डेटा से आएगा बदलाव? अब सटीक प्लानिंग का दावा
प्लेटफॉर्म में जो आंकड़े हैं, वे सैटेलाइट, GPS, मौसम विभाग, कृषि विभाग और केंद्रीय भूजल बोर्ड से लिए गए हैं। हालांकि डॉ. सिंह ने साफ किया कि इनमें से कुछ डेटा—जैसे मिट्टी की बनावट या पानी की गहराई—हर साल अपडेट नहीं होंगे, बल्कि दशक में एक बार ज़रूरत के अनुसार बदलाव होंगे।
सरकार का कहना है कि अब जल संकट का हल सिर्फ नल या ट्यूबवेल से नहीं, डेटा और प्लानिंग से निकलेगा। यही वजह है कि एटलस को किसानों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और शहरी योजनाकारों के लिए उपयोगी बनाया गया है।
ज्यादा पानी पीने वाली फसलों की होगी पहचान, बदलाव के सुझाव भी देगा एटलस
AI आधारित यह प्लेटफॉर्म फसल पैटर्न को भी ट्रैक करता है ताकि यह देखा जा सके कि कहां-कहां अधिक जल की खपत हो रही है। इस जानकारी के आधार पर फसल चक्र में बदलाव, जल संरक्षण योजनाएं, और रीचार्ज स्ट्रक्चर के निर्माण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
लेकिन IIT रुड़की के एक पर्यावरण विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “प्लेटफॉर्म की जानकारी तभी उपयोगी होगी जब वह नीति निर्माण और ज़मीनी कार्य में तब्दील हो। वरना ये भी एक और सरकारी वेबसाइट बनकर रह जाएगा।”
लोकल भागीदारी से सुधरेगा सिस्टम, सरकार ने की आम जनता से अपील
HARSAC के अनुसार, स्थानीय नागरिकों की भागीदारी के बिना यह पहल सफल नहीं हो सकती। RWAs, शिक्षक, पंचायतें, और NGO इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करें और सुझाव दें कि इसे और बेहतर कैसे बनाया जाए।
डिजिटल गवर्नेंस का दावा, लेकिन असली परीक्षा होगी ज़मीनी सुधार
सरकार इस पहल को डिजिटल गवर्नेंस के नए युग की शुरुआत बता रही है, लेकिन इस बीच राज्य के कई हिस्से अनियमित बारिश, बेतरतीब शहरीकरण और गिरते एक्विफर लेवल से जूझ रहे हैं। अब देखना होगा कि ये डिजिटल एटलस हरियाणा को जल संकट से निकाल पाता है या नहीं।