Karela ki Kheti: गेहूं-सरसों के बाद करें ‘स्टार किस्म’ करेला की खेती, जानिए कैसे
करेला यानी वह सब्जी जिसे स्वाद से ज्यादा स्वास्थ्य के लिए खाया जाता है, अब किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली खेती बनती जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो गेहूं और सरसों की फसल...

करेला यानी वह सब्जी जिसे स्वाद से ज्यादा स्वास्थ्य के लिए खाया जाता है, अब किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली खेती बनती जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो गेहूं और सरसों की फसल कटने के बाद खाली खेतों में करेले की ‘स्टार किस्म’ बोना एक व्यावसायिक रूप से बेहद फायदेमंद विकल्प बन चुका है। खासकर अप्रैल से जून के बीच इसकी खेती बेहतर नतीजे देती है।
करेले की मांग बाजार में लगातार बनी रहती है, क्योंकि यह स्वाद और सेहत दोनों का बेहतरीन मेल है। इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट इसे न केवल पोषक बनाते हैं, बल्कि इसकी बाजार में कीमत भी अच्छी दिलाते हैं। यही वजह है कि छोटे और मध्यम वर्ग के किसान अब पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
स्टार किस्म की करेले की खेती न केवल कम समय में तैयार हो जाती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी बढ़ाती है। इस तरह यह खेती किसानों के लिए ‘दोहरी कमाई’ का जरिया बन जाती है—एक तरफ फसल का मुनाफा और दूसरी ओर भूमि की गुणवत्ता में सुधार।

करेले की खेती: कम लागत, ज़्यादा मुनाफा
खेती-किसानी का असली खेल है सही समय पर सही फसल का चुनाव करना। गेहूं और सरसों की कटाई के बाद जब खेत खाली पड़े रहते हैं, तब करेले की खेती एक ऐसा विकल्प बनकर उभरती है जो कम निवेश में अच्छा मुनाफा देने का दम रखती है।
डॉ. संदीप सिंहमार के अनुसार, करेले की स्टार किस्म विशेष रूप से गर्मियों में खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। यह किस्म तेज़ी से बढ़ती है और मात्र 55 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। मतलब, दो महीने के अंदर किसान ताज़ा करेला बेचकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं—बिलकुल बिना किसी लंबी प्रतीक्षा के।
बाजार में करेले की डिमांड कोई नई बात नहीं है। इसके कड़वे स्वाद के पीछे छिपे स्वास्थ्य लाभ आजकल लोगों को खूब लुभा रहे हैं। डायबिटीज कंट्रोल करना हो या पाचन शक्ति बढ़ानी हो, करेला हर जगह फिट बैठता है। यही वजह है कि होटल से लेकर घरेलू रसोई तक, इसकी मांग बनी रहती है।
मिट्टी के लिए भी है फायदेमंद
करेले की खेती सिर्फ जेब नहीं भरती, बल्कि खेत की सेहत भी सुधारती है। करेला उगाने से मिट्टी की उर्वरता में इज़ाफा होता है। इसके पौधे ऐसे पोषक तत्व छोड़ते हैं जो अगली फसल के लिए ज़मीन को और उपजाऊ बना देते हैं। यानी, आज बोओ करेला और कल काटो उसकी मिठास—भले स्वाद में कड़वा हो!
विशेषज्ञ मानते हैं कि करेले की खेती के लिए रेतीली या रेतीली-दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है, जिसमें जल निकासी अच्छी हो। पानी का ठहराव करेले को सूट नहीं करता। इसलिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था आवश्यक है।
जैविक खाद और तकनीक का मेल
करेले की स्टार किस्म के बीज जब जैविक खाद के साथ बोए जाएं, तो उसका असर सिर्फ पैदावार पर ही नहीं बल्कि गुणवत्ता पर भी दिखता है। जैविक खाद न सिर्फ मिट्टी को पोषक बनाती है, बल्कि इससे उपजे फल भी सेहत के लिहाज़ से कहीं अधिक फायदेमंद होते हैं।
खेती के दौरान सिंचाई की नियमितता, समय पर गुड़ाई और कीट नियंत्रण जैसी बुनियादी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। लेकिन अच्छी बात ये है कि करेला इन सभी मामलों में ज्यादा जिद्दी नहीं होता—थोड़ी देखभाल में भी शानदार नतीजे दे सकता है।
अतिरिक्त आमदनी का मौका
अगर आर्थिक मजबूती की बात करें तो करेले की खेती गेहूं या सरसों जैसी बड़ी फसलों के बाद खेतों को खाली रखने से बेहतर विकल्प है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी का मौका मिलता है, साथ ही देश की खाद्य सुरक्षा में भी योगदान होता है। अप्रैल से जून के बीच की जलवायु करेले की स्टार किस्म के लिए आदर्श मानी जाती है। इस दौरान धूप और तापमान का तालमेल इसकी तेज़ी से बढ़वार में मदद करता है। और सबसे बड़ी बात—यह फसल बहुत अधिक देखभाल या खर्च नहीं मांगती।
जो किसान गेहूं-सरसों की फसल के बाद सोचते हैं कि अब अगली बुआई तक खेतों को खाली छोड़ दिया जाए, उन्हें एक बार करेले की स्टार किस्म पर जरूर विचार करना चाहिए। कम खर्च में तैयार होने वाली इस फसल की मांग तो है ही, साथ ही अच्छी पैदावार होने से किसान को मुनाफ़ा भी अच्छा होता है।